पाडर कि पावन भूमि पर जब ग्रेफ द्वारा सड़क बनाई जा रही थी, उस समय कि लिखी कविता मे आप सब के सामने रखना चाहता हूँ |(यह कविता मैं ने 09/12/1989 को लिखी थी, जिस दिन गलहार-पाडर रोड का उद्घाटन करने के लिए जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल जनरल के ० वी० कृष्णाराव अठोली पाडर पधारे थे और उन्होंने औपचारिक रूप से इस सड़क को गाड़ियों के लिए खोला था।उस दिन अठोली में बहुत बड़ा समारोह हुआ था ।उस अवसर पर हम ने वहां एक पाडरी गीत राज्यपाल महोदय के सामने प्रस्तुत किया था जो कि मैं ने इसी अवसर के लिए तत्कालीन बी० डी० ओ० पाडर श्रीमान जिया लाल परिहार के आग्रह पर विशेष रूप से लिखा था जो कि बहुत लोकप्रिय हुआ था। इसी अवसर पर मैंने यह कविता भी पढ़ी थी ,जिसे काफी सराहा गया था।) उस समय कि परिस्थितियों को इस कविता मे मैंने उतारने का प्रयास किया है | आशा है आपको पसंद आएगी|

” कविता “

धन्यवाद तुम्हारा ग्रेफ वालो,
जो राह नई दिखलाई है ।
पाडर का बच्चा बच्चा तुम
को देता आज बधाई है ।

आशा की आज नई ज्योति,
जो तुम ने यहां जगाई है।
पाडर की जनता को तुमने,
इक भोर नई दिखलाई है ।

अब खुलें नए साधन यहां,
अब खुलें नए रोजगार यहां।
अब हटे गरीबी पाडर से,
न रहे कोई बेकार यहां ।


प्रगति के नित नए पथ अब,
पाडर में खुलते जाएंगे ।
अब हम पाडर के वासी भी,
इक मंजिल नई बनाएंगे ।


हम पाडर के लोगों का तुम ने,
ऐ ग्रेफ वालो उद्धार किया ।
इन दीन दुखी लोगों पर तुम ने,
आज बड़ा उपकार किया ।

नहीं शब्द हमारी वाणी में,
जो प्रकट आज आभार करें ।
धन्यवाद तुम्हारी किरपा का,
हम कोटि-कोटि बार करें ।


नहीं घबराना सीखा तुम ने,
आंधी से और तुफानों से।
तुम निर्भय हो टकराते हो,
पहाड़ों से चट्टानों से ।


तुम पर्वत जंगल काट काट
कर रस्ते नए बनाते हो ।
हर भूले भटके राही को,
तुम राह नई दिखलाते हो।

तुम ही हो सच्चे कर्मवीर,
जो कर्म किए ही जाते हो ।
चाहे हो सामने मौत खड़ी,
नहीं उस से भी घबराते हो।


तुम सदा सहारा देते हो,
निर्बल और बेसहारों को।
तुम प्रेम की सुधा पिलाते हो,
बीमारों को लाचारों को ।


औरों की खातिर करते हो,
तुम अपना जीवन कुर्बान ।
तुम परोपकार की मूर्त हो,
अफसर हो चाहे हो जवान ।

जब तक ये पर्वत ये जंगल ,
और यह वादी आबाद रहें ।
इस धरती के बासी तुमको,
हर युग में करते याद रहें ।

था कहां गलहार कहां किश्तवाड़,
और कहां अठोली का यह गांव।
हम चल चल कर मर जाते थे,
छालों से भर जाते थे पांव।


आज गाड़ी यहां जो आई है,
तो खुशी चार सू छाई है ।
मुस्कान है हर इक चेहरे पर,
घर घर में आज बधाई है।


आज धन्य हुए पाडर वासी,
आए हैं राज्यपाल यहां ।
अपनी आंखों से देखेंगे,
क्या है लोगों का हाल यहां ।

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हम उनकी , सेवा में आज,
यह नम्र निवेदन करते हैं ।
पाडर पर रहे कृपा द्रष्टि,
हम यही आवेदन करते हैं।

हम आशा करते हैं कि आप,
हम पर स्नेह बरसाएंगे ।
पाडर की प्रगति के खातिर
कुछ और भी कदम उठाएंगे ।


आभार को कैसे प्रकट करें ,
देने को कुछ उपहार नहीं,
बस प्रेम से बढ़कर हम लोगों
के पास कोई उपहार नहीं ।


यदि आज ईश्वर पूछे मुझे,
कि बोल “मधुर”क्या चाहिए तुझे?
बस यह मांगों कि Beacon के,
अफसर , जवान आबाद रहे ।

(मधुर पाडरी)

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5 COMMENTS

  1. बहुत ही सुंदर, सर ये कविता सुनकर बहुत ही आनंद की अनुभूति हो रही है,सोच रहा हूं अपका धन्यवाद् कैसे करू, में तो कुछ समय के लिए यही प्रतीत कर रहा था कि में ,1990 के दशक में हूं।

    हृदय की गहराई से आपका धन्यवाद् गुरू जी।

  2. बहुत ही सुंदर शब्दों में GREF वालों का आभार प्रगट किया गया है।अदभुत कला।
    अपने ह्रदय के भावों सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है।अति सराहनीय

  3. अद्भुत भैया जी
    ऐसा कवि हमारा भाई है
    हमे तो पता ही नही था
    भैया जी
    जहाँ पहुँचे ना रवि वहाँ पहुँचे कवि
    ग्रिफ् वालों की रोज़गार का वर्ण ऐसे शब्दों में किया है
    जो शब्द सीधे पत्थर में भी जान फूँक रहे हैं
    कोटि कोटि नमन आपको

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