This new poem by Ravi Ji is based on the limitations of man. He has shown how in this new world man has reduced himself to a mere body of flesh and bones and made himself a puppet in the hands of his uncontrolled desires. This will work as an antidote to stress. A must read for all.

“हे मानव तू दुख का कारण स्वयं बना है”

 

हे मानव तू दुख का कारण स्वयं बना है।

तूने निंदा को अपनाकर जीवन व्यर्थ गंवाया
मन में वैर भाव का तूने है जो बीज उगाया
ऐ नादान नहीं जानता है तू इन सब पापों का
परिणाम भयंकर होता है इन बातों का
भगवान भी साथ नहीं देता है ऐसी बातों का।

ऐ मानव तू दुख का कारण स्वयं बना है।

ईर्ष्या और द्वेष से तूने निज को जलाया
बदले की भावना से अंतर्मन को दुखाया
ऐ नादान नहीं जानता है तू इन विकारों का
परिणाम भयंकर होता है ऐसे कुसंस्कारों का
भगवान भी साथ नहीं देता है ऐसे व्यवहारों का।

ऐ मानव तू दुख का कारण स्वयं बना है।

तूने अहंकार की भाषा कह कर दुश्मन किया जमाना सारा
तूने षड़यंत्रों को बुनते बुनते बिता दिया है जीवन सारा
ऐ नादान नहीं जानता है तू इन सब बातों का
परिणाम भयंकर होता है इन पापों का
भगवान भी साथ नहीं देता है ऐसे हालातो का।

ऐ मानव तू दुख का कारण स्वयं बना है।

अब तो ज़रा सम्भलने की तू कोशिश कर
अपने अंतर्मन को अब तू रोशन कर
भय काम क्रोध और लोभ मोह को अपने ही तू वश में कर
नित योग ध्यान और प्राणायाम से उस ईश्वर को जान ले
वही न्याय से सबको है जो दंडित करता।
इसको अपने मन में अब तू जान ले।।

ऐ मानव तू दुख का कारण स्वयं बना है।।

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