अब बकरे नहीं आएंगे

 

वर्षों पूर्व तक छोटे छोटे बकरे

मेरे घर ननिहाल के यहाँ से

पहुंचा करते थे हर साल

जनवरी के महीने मे

जब बाहर बर्फ अपनी सफेदी से

पाडर क़ी धरती सजा दिया करती थी |

यूँ तो, था मे शाकाहारी, पर ये

बकरे मे बड़े चाव से खाता था

कभी उनकी टांगे तोड़ कर

कभी सींग, तो कभी पूँछ|

कुछ अलग ही मज़ा होता था

सर्दियों मे ये सब चीज़ेँ खाने का

आज भी इंतज़ार रहता है

क़ी कहीं कोई बकरा भेज दे प्यार से

सर्दीयां बाहर कड़ाके क़ी हैँ

और चाय पे गुज़ारा करना पड़ रहा है

ऊपर से ये कंचति का त्यौहार

बढ़ा रहा है तलब तरह तरह के पकवानों क़ी

परन्तु अब बकरे नहीं आएंगे

बीते jhaazoo, chakaid ya gartiyashi का दिन|

 

क्यूंकि वो क्या है ना

अब मेरे नाना जी नहीं हैँ इस दुनिया मे

उनका बोहत शौक था मेरे इस

पतले शरीर को देख, मुझे मास खिलाने का

मासाहारी तो मे ना बना उनके कहने से कभी

परन्तु हाँ मे उनका दिल रखने के लिए उनसे

इस त्योहार पर

आटे के बने बकरे ज़रूर मंगवा लिया करता था|

Kanchaiti का त्यौहार आज भी है

ठण्ड भी बोहत है बाहर

याद भी नाना जी क़ी आ रही है

परन्तु अब ननिहाल से बकरे नहीं आएंगे|

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