एक युवा अपने माता पिता, अपने मित्रों और अपने प्रिय जनों से निवेदन करता हुआ, जीवन के इस सफर मे कदम आगे रखता हुआ, चुनौतीयों का सामना करने कि हुंकार भरता हुआ, अपनी भावनाओं को इस कविता के रूप मे पिरोता हुआ|

आशा है आप सभी युवाओं के ह्रदय को छू अपने स्वपनो कि और उड़ान भरने मे प्रेरित करेगी ये कविता| धन्यवाद||

 

“”बह लेने दो मुझे””

अब नदी बन
बह लेने दो मुझे
जो रोके कोई
तो बन समुंदर
रास्ता अपना खुद
ढूंढ लेने दो मुझे,

जो रुकूं भी तो
बांध से कर विनती
बन बिजली कइ
रोशन घर कर तुम
बह देने दो मुझे,

सफर मे जो
मिले हमसफ़र
तो मिल उस से
ओर होके शांत
बह देने दो मुझे,

आने दो पत्थर
आने दो चट्टाने
तुम बस निरंतर
बह कर उन्हें भी ना
घिस देने दो मुझे,

मोड़ दे रास्ता राह
जो मेरा कोई
तुम वहां भी ना
सहायता यहाँ वहां
कर लेने दो मुझे,

डाले जो कचरा
नकारात्मकता कोई
उनकी भी तुम
समस्या अथाह बन
हर लेने दो मुझे,

मिलूं ना मिलूं
उस सागर से मे
चाहे हो जाऊं बीच
मरुस्थल मे खाख
गर थम भी जाऊं तो
तुम गुरुत्वाकर्षण से
अपने खींच लेना,

पर निवेदन ये मेरा तुम
बह लेने दो मुझे|

“आशीष”

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